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भारतीय महिलाओं में बच्चेदानी के मुख का कैंसर दूसरा सर्वाधिक पाया जाने वाला एक कैंसर है।[1]

नियमित परीक्षण एवं पूर्व निदान द्वारा इस कैंसर का सरलता से बचाव संभव हैं दुर्भाग्यवश भारत में महिलाओं को कैंसर परीक्षण एवं इसके बचाव की जानकारी नहीं है।

 

बच्चेदानी का मुख क्या है?

बच्चेदानी का मुख क्या है?

बच्चेदानी का मुख गर्भाशय ग्रीवा के रूप में भी जाना जाता है, जो गर्भ के निचले हिस्से में होता है। बच्चेदानी का मुख योनि को गर्भाशय से जोड़ता है। गर्भाशय ग्रीवा के दो मुख्य हिस्से हैः अंतगर्भाशय ग्रीवा (एंडोसर्विक्स) और बहिर्जरायुग्रीवा (एक्टोसर्विक्स) जो लगभग 2-3 से.मी. है

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महामारी विज्ञान

महामारी विज्ञान

भारतवर्ष में बच्चेदानी के मुख का कैंसर अन्य देशों की तुलना में अधिक है।

प्रतिवर्ष लगभग 1.23 लाख महिलायें बच्चेदानी के मुख से ग्रस्त पाई जाती हैं और करीब 67,500 महिलाओं की इससे मृत्यु हो जाती है।[1]

यह आंकड़े शहरों की तुलना में ग्रामीण परिक्षेत्र में ज्यादा है।[2]

जोखिम कारक

जोखिम कारक [3]

 

  • बच्चेदानी के मुख में ह्यूमन पैपीलोमा वायरस (एच.पी.वी.) का लम्बे समय तक संक्रमण
  • बार-बार गर्भधारण करना
  • एक से अधिक स्त्री/पुरुष के साथ यौन संबंध रखना
  • कम उम्र में संभोग की शुरुआत
  • धूम्रपान
  • एच.आई.वी./एड्स/अंग प्रत्यारोपण, कुछ दवाएं इत्यादि

रोकथाम

रोकथाम

(I) प्राथमिक रोकथाम: प्राथमिक रोकथाम द्वारा बीमारी को होने से पहले ही रोका जा सकता है।

  • सुरक्षित यौन संबंध (एक से अधिक यौन संबंध न रखना)
  • कंडोम का प्रयोग एच.पी.वी. संक्रमण को कम करता है।
  • प्रजनन पथ संक्रमण का समय पर उपचार।
  • ऐसे प्रमाण मिले है की पुरूष का खतना यौन साथी के बीच संक्रमण की घटनाओं को कम करता है।
  • एच.पी.वी. संक्रमण[4]गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर के लिये जिम्मेदार एच.पी.वी. वायरस 16 एवं 18 के लिये रोगनिरोधी टीकाकरण। एच.पी.वी. टीकाकरण सभी प्रकार के एच.पी.वी. वायरस के लिये असरकारक नहीं है। वर्तमान में दो टीके बाजार में उपलब्ध है। महिलायें जो एच.पी.वी संक्रमण के संपर्क में न आई हो उनहें इस टीकाकरण से ज्यादा लाभ होने की संभावना हैं।

इंडियन एकेडमी आफ पीडिएट्रीक्स (आई.ए.पी.) की एचपीवी टीकाकरण पर की गई सिफारिश के अनुसार:

  • 9-14 वर्ष आयु वर्ग की किशोर/पूर्व-किशोरियों के लिये दो एचपीवी टीके के दोनों में से केवल 2 खुराक
  • 15 वर्ष की लड़कियाँ और प्रतिरक्षित व्यक्तियों के लिए 3 खुराक की सिफारिश है
  • दो खुराक के बीच कम से कम 6 महीने के अंतराल पर होना चाहिए
  • 3 खुराक अनुसूची के लिए 0, 1-2 (ब्रांड पर निर्भर करता है) और 6 महीने में प्रशासित किया जा सकता है

 

गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर के खिलाफ यह टीका पूरी सुरक्षा की गारंटी नहीं है। कैंसर जांच परीक्षण भी आवश्यक है क्योंकि:

  • एच.पी.वी. टीकाकरण से गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर के विकास की संभावना को कम करने के लिये कई वर्ष लगेंगे।
  • टीकाकरण सभी प्रकार के एच.पी.वी. से बचाव नहीं करता।
  • गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर के लिये केवल एच.पी.वी. 16 एवं 18 ही जिम्मेदार नहीं है। इनके अतिरिक्त अन्य एच.पी.वी. वायरसों से भी गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर हो सकता है।

वैक्सीन के संरक्षण की अवधि:
टीका संरक्षण की अवधि स्पष्ट नहीं है। वर्तमान अध्ययन यह संकेत देते है की यह टीकाकरण 5 साल के लिये प्रभावी है। टीके की लंबी अवधि की प्रभावकारिता की जांच चल रहीं है।

 टीकाकरण गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर के परीक्षण का प्रतिस्थापन नहीं है।

 वर्तमान में हमारे दशे में एच.पी.वी. टीकाकरण पर कोई दिशानिर्देश नहीं है।

 (II) माध्यमिक रोकथाम: माध्यमिक रोकथाम से बीमारी को जांच द्वारा पूर्व अवस्था में ही पता लगाया जा सकता है, और उसे आगे बढ़ने से रोका जा सकता है।

यह जांच स्वस्थ्य महिलाओं में की जाती है ताकि गर्भाशय ग्रीवा में होने वाले परिवर्तन का निदान किया जा सके तथा भविष्य में कैंसर के विकास को रोका जा सके। गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर के लिये उपलब्ध स्क्रीनिंग परिक्षणें में पैप स्मीयर, विजुअल इन्सपेक्शन विद एसिटिकएसिड (वाया), विजुअल इन्सपेक्शन विद ल्यूगोल्स आयोडीन (विली) और एच.पी.वी. टेस्ट शामिल है।

पैप स्मीयर जांच

पैप (पैपानीकोलाऊ) जांच एक परीक्षण विधि है, जो पिछले 60 वर्षों से ग्रीवा की कोशिकाओं में संभावित पूर्व कैंसर और कैंसर परिवर्तन का पता लगाने के लिये प्रयोग की जा रही है।

पैप स्मीयर एक सरल एवं दर्द रहित परीक्षण विधि है, जिसमे बच्चेदानी के मुख से थोड़ा सा तरल पदार्थ लेकर कैंसर का पता लगाया जाता है। इस जांच के दौरान एक औजार (स्पैकुलम) योनिमार्ग में डाला जाता है और लकड़ी के टुकड़े (स्पैचुअला) या साइटोब्रश द्वारा हल्क हाथ से बच्चेदानी के मुख से कुछ कोशिकायें (सेल्स) ली जाती है। इन सेल्स को कांच की स्लाइड पर फैलाया जाता है जिसे एक्लोहल (फिक्सेटीव) में डालकर आगे के परीक्षण हेतु प्रयोगशाला में भेजा जाता है। यह परीक्षण 21 वर्ष से ऊपर की सभी विवाहित महिलाओं को तीन वर्ष में एक बार अवश्य कराना चाहिये। यदि यह जांच एच.पी.वी. जांच के साथ मिलकर की जाये तो तीन साल के स्थान पर पांच वर्ष में एक बार कराई जा सकती है। (30 वर्ष से ऊपर की महिलाओं में)

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पैप स्मीयर जांच

गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर की जांच की अन्य परीक्षण विधियां

एच.पी.वी परीक्षण द्वारा यह पता लगाया जाता है कि उसमें एच.पी.वी का डी.एन.ए अथवा आर.एन.ए उपस्थित है या नहीं । इसमें बच्चेदानी के मुख से कुछ कोशिकाएं (सेल्स) ली जाती है और प्रयोगशाला में परीक्षण किया जाता है। तीस (30) वर्ष से कम उम्र की महिलाओं में यह जांच करवाने की सलाह नहीं दी जाती है क्योंकि एच.पी.वी. संक्रमण इस उम्र में बहुत सामान्य है और अधिकतर महिलाओं में यह संक्रमण स्वतः ही 2 वर्ष तक समाप्त हो जाता है।

विजुअल इंस्पेक्शन विद एसिटिक एसिड (वाया) और विजुअल इंस्पेक्शन विद ल्यूगोल्स आयोडीन (विलि)  इन परीक्षण विधि का उपयोग कैंसर की पूर्व अवस्था का पता लगाने के लिये किया जाता है।[8] इन परीक्षण विधियों के लिये किसी प्रयोगशाला और नमूने के परिवहन की आवश्यकता नहीं होती। महिलाओं को तत्काल इस परीक्षण विधि का परिमाण भी उपलब्ध हो जाता है। इन परीक्षण विधियों को चिकित्सक, नर्सों और दाइयों द्वारा निष्पादित किया जाता है, बशर्ते उन्हें पर्याप्त प्रशिक्षण और पर्यवेक्षण प्राप्त हो।

असामान्य पैप परीक्षण

यदि पैप परीक्षण असामान्य है तो इसका यह मतलब नहीं है कि आपको कैंसर ही है। कई बार गर्भाशय ग्रीवा में कोई अन्य छोटी समस्या भी हो सकती है। यदि पैप परीक्षण के परिणाम स्पष्ट नहीं है तो आपके चिकित्सक पैप परीक्षण दोहरा सकते हैं या छह महिने अथवा एक साल में दुबारा करवा सकते हैं। कुछ असामान्य कोशिकाओं को गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर में बदलने से रोका जा सकता है। यदि पैप परीक्षण असामान्य है तो इसके आगे के उपचार के विषय में आपको अपने चिकित्सक से परामर्श करना चाहिये। उपचार अक्सर बाह्य रोगी विभाग (ओ.पी.डी.) में किया जाता है। यदि परीक्षण के दौरान गर्भाशय ग्रीवा की कोशिकाओं में अधिक गंभीर परिवर्तन पाये जाते है तो चिकित्सक कुछ उन्नत परीक्षणों का सुझाव देंगे। इन परीक्षण परिणामों से आपके चिकित्सक को उचित उपचार करने के फैसले में मदद मिलेगी।

पैप स्मीयर परीक्षण

पैप स्मीयर परीक्षण

पैप स्मीयर ग्रीवा से कोशिकाओं के एक छोटे से सैम्पल एकत्र करने की एक साधारण परीक्षण विधि है, जो गर्भाशय ग्रीवा के पूर्व कैंसर और कैंसर की स्थिति का निदान करने में मदद करता है। यह विधि प्रजनन पथ के संक्रमण और सूजन के निदान में भी सहायक है।

पैप स्मीयर परीक्षण किन महिलाओं को कराना चाहिये?

अन्तर्राष्ट्रीय अनुसंधान के अनुसार स्क्रीनिंग की प्रारम्भिक आयु 21 वर्ष है। तीस वर्ष से ऊपर की सभी महिलाओं को पैप स्मीयर परीक्षण हर तीन साल में एक बार 65 वर्ष की आयु होने तक कराना चाहिये।

महिलाएं जिन्हें नियमित पैप परीक्षण की आवश्यकता नहीं है?

  • 21 वर्ष से कम आयु की और 65 वर्ष से ऊपर की महिलाएं
  • महिलायें जिनका सौम्य बीमारी के लिये गर्भाशय निकाल दिया गया हो। 

पैप परीक्षण कब किया जाना चाहिये? 

उचित परिमाणों के लिये पैप परीक्षण मासिक धर्म के पहले 10 से 20 दिनों के बीच करवाना चाहिये। परीक्षण के दौरान महिला को मासिक स्त्राव नहीं होना चाहिए।

पैप परीक्षण की तैयारी 

परीक्षण से 48 घंटे पूर्व निम्न क्रियाओं से बचेः  

  • संभोग
  • योनि को डूशिंग करना
  • योनि दवा
  • योनि गर्भ निरोधक जैसे क्रीम/जैली 

कार्यविधि 

इस विधि में एक औजार (स्पेकुलम) को योनिमार्ग में डालकर बच्चेदानी का मुंह देखा जाता है। इस प्रक्रिया के दौरान महिला को थोड़ी सी असुविधा या ऐंठन हो सकती है, परन्तु आमतौर पर इसमें ज्यादा दर्द नहीं होता। एक छोटी सी लकड़ी को (स्पैचुअला) द्वारा गर्भाशय ग्रीवा के निचले भाग की सतह से कोशिकाएं (सेल्स) ली जाती हैं। इन सेल्स को कांच की स्लाइड पर फैलाया जाता है, जिसे एल्कोहल (फिक्सेटीव) में डालकर आगे के परीक्षण हेतु प्रयोगशाला में भेजा जाता है। 

पैप जांच परिणाम 

पैप जांच परिमाण की रिपोर्ट सामान्य या असामान्य आती है। 

  • सामान्य पैप जांच 

यदि पैप जांच का परिणाम सामान्य आता है तो इसका मतलब जांच में कैंसर के काई लक्षण नहीं है।

  • असामान्य पैप जांच 

यदि पैप परीक्षण असामान्य है तो इसका यह मतलब नहीं है कि आपको कैंसर ही है। कई बार गर्भाशय ग्रीवा में कोई अन्य समस्या भी हो सकती है। यदि पैप परीक्षण के परिणाम स्पष्ट नहीं है तो आपके चिकित्सक पैप परीक्षण तुरंत दोहरा सकते है। कुछ असामान्य कोशिकाओं को गर्भाशय ग्रीवा के कैंसर में बदलने से रोका जा सकता है। यदि पैप परीक्षण असामान्य है तो इसके आगे के उपचार में विषय में आपको अपने चिकित्सक से परामर्श करना चाहिए। उपचार अक्सर बाह्य रोगी विभाग (ओ.पी.डी.) में किया जाता है। यदि परीक्षण के दौरान गर्भाशय ग्रीवा की कोशिकाओं में अधिक गंभीर परिवर्तन पाये जाते है तो चिकित्सक कुछ उन्नत परीक्षणों का सुझाव देंगे। इन परीक्षण परिणामों से आपके चिकित्सक को उचित उपचार करने के फैसले में मदद मिलेगी। कुछ उन्नत नैदानिक परीक्षणों द्वारा इसकी पुष्टि की जाती है: 

दूरबीन की जांच (कोल्पोस्कोपी): इस प्रक्रिया में एक सूक्ष्मदर्शी यंत्र द्वारा योनिमार्ग और बच्चेदानी के मुख में होने वाले परिवर्तन या बदलाव का पता लगाया जाता है।

टुकड़े की जांच (बायोप्सी): इस विधि में बच्चेदानी के मुख से छोटा सा टुकड़ा लिया जाता है और सूक्ष्मदर्शी यंत्र (माइक्रोस्कोप) दवारा कैंसर के परिवर्तन देखे जाते है। यह प्रक्रिया बाह्य रोगी विभाग (ओ.पी.डी.) में ही सम्पन्न की जाती है और महिला को अस्पताल में दाखिल होने की आवश्यकता नहीं है।  

संकेत और लक्षण

संकेत और लक्षण

 

  • अत्याधिक मासिक धर्म का होना, मासिक धर्म होने के पश्चात् धब्बा या खून जाना और मासिक धर्म के पश्चात् (रजोनिवृति) महीना होना।
  • संभोग के बाद खून आना
  • संभोग के दौरान दर्द होना
  • पेट के निचले हिस्से या श्रोणि में दर्द
  • असामान्य या अत्याधिक योनी स्त्राव

इनमें से किसी भी संकेत या लक्षण का मतलब यह नहीं है कि आपको निश्चित रूप से कैंसर है, परन्तु यदि इनमें से कोई भी लक्षण हो तो आपको किसी कुशल चिकित्सक से परामर्श करना चाहिये।

रोग निदान

रोग निदान

 

यदि इनमें से कोई भी जांच (पैप जांच, वाया और एच.पी.वी.) पाॅजिटिव पाई जाती है तो कुछ अन्य उन्नत परीक्षण (दूरबीन एवं टुकड़े की जांच) किये जाते है। जिससे यह पता लगाया जा सके कि कैंसर है या नहीं।

 

  • दूरबीन की जांच (काल्पोस्कोपी): इस विधि द्वारा दूरबीन द्वारा योनिमार्ग और बच्चेदानी के मुख में होने वाले परिवर्तन का पता लगाया जाता है।
  • टुकड़े की जांच (बायोप्सी): यदि पानी की जांच के दौरान कोई विसंगति पाई जाती है तो टुकड़े की जांच की जाती है। जिसमें बच्चेदानी के मुख से छोटा सा टुकड़ा लेकर प्रयोगशाला में परिक्षण किया जाता है। यह एक सरल विधि है जिसे बाह्य रोगी विभाग (ओ.पी.डी.) में ही कर सकते है और इसके बाद महिला घर जा सकती है। यदि चिकित्यक बड़े टुकड़े की जांच (कोन बायोप्सी) की आवश्यकता समझता है तो उस स्थिति में महिला को अस्पताल में भर्ती होकर जांच करानी पड़ती है। यह प्रक्रिया, कैंसर किस हद तक बढ़ चुका है, यह पता लगाने के लिय की जाती है।

स्टेज

स्टेज [9]

 

बीमारी किस हद तक फ़ैल चुकी है इसका पता लगाने की प्रकिया को स्टेजिंग (अवस्था) कहा जाता है।

स्टेज 0 या कैंसर-इन-सिटु:  इस अवस्था में बच्चेदानी के मुख की अंदरूनी सतह में असामान्य कोशिकाएं पाई जाती है जिन्हें आंखों द्वारा नहीं देखा जा सकता। इस अवस्था में कैंसर बच्चेदानी के मुख तक ही सीमित होता है।

पहली अवस्था: इस अवस्था में कैंसर बच्चेदानी के मुंह तक ही सीमित रहता हैं।

दूसरी अवस्था: इस अवस्था में कैंसर बच्चेदानी के मुंह से आगे पहुंच जाता है पर श्रोणि दीवार तक या योनि के निचले तिहाई हिस्से तक नहीं पहुंचता।

तीसरी अवस्था: इस अवस्था में कैंसर योनि के निचले तिहाई हिस्से या श्रोणि दीवार तक पहुंच जाता है, जो गुर्दे को भी प्रभाविक कर सकता है।

चौथी अवस्था: इस अवस्था में कैंसर मूत्राशय एवं मलाशय अथवा शरीर के अन्य भागों तक फैल जाता है।
 

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उपचार

उपचार

 

बच्चेदानी के मुख के कैंसर के लिये तीन तरह की उपचार पद्धति हैः सर्जरी (शल्यचिकित्सा), रेडियोथेरेपी (बिजली की सिकाई) और कीमोथेरेपी (दवाइयों द्वारा)। इन पद्धतियों को अकेले या एक दूसरे के संयोजन में दिया जा सकता है। कैंसर का उपचार, उसकी स्टेज, प्रकार और महिला की स्वास्थ्य स्थिति पर निर्भर करता है। 

 

पूर्व कैंसर अवस्था में उपचार: इसमें कैंसरयुक्त कोशिकाओं को हटाया जाता है।

  •  क्रायोसर्जरी: इस प्रक्रिया में बच्चेदानी के मुख पर ठंडी सिकाई द्वारा असामान्य उत्तकों को नष्ट किया जाता है, इस विधि में करीब 5 मिनट का समय लगता है।

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  • लीप: इस विधि द्वारा प्रभावित हिस्से में कैंसरयुक्त कोशिकाओं को बिजली के पतले तार (लो वोल्टेज) द्वारा हटा दिया जाता है।

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  • लेजर शल्यचिकित्सा: इसमें लेजर प्रक्रिया द्वारा असामान्य कोशिकाओं को जला दिया जाता है।
  • कोनाइजेशन: इस विधि द्वारा कोन के आकार का टुकड़ा निकाल कर कैसर युक्त कोशिकाओं को हटा दिया जाता है। यह प्रक्रिया महिला को बेहोश करके अस्पताल के शल्यकक्ष (आपरेशन थियेटर) में सम्पन्न की जाती है।

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  • हिस्ट्रैक्टमी (गर्भाशय विच्छेदन/बच्चेदानी को निकालना) जिन महिलाओं में रसौली कोनाइजेशन द्वारा नहीं निकाली जा सकती और जिन्हें बच्चे नहीं चाहिये उन महिलाओं में यह शल्ययिकित्सा की जाती है। बच्चेदानी के मुख के कैंसर का अग्रिम उपचार कैंसर की अवस्था के अनुसार किया जाता है।

संदर्भ

संदर्भ

 

[1] Ferlay J, Soerjomataram I, Ervik M, et al. (2013) GLOBOCAN 2012 v1.0, Cancer Incidence and Mortality Worldwide: IARC Cancer Base No. 11.Lyon, France: http://globocan.iarc.fr. Accessed on 04 Sep 2014

[2] Kurkure AP, and Yeole BB. Social inequalities in cancer with special reference to South Asian countries. Asian Pac J Cancer Prev 2006;7:36-40
[3] Bosch FX, de Sanjosé S. Chapter 1: Human Papillomavirus and Cervical Cancer–Burden and Assessment of Causality. J Natl Cancer Inst Monogr 2003;31:3-13
[4] Vashishtha VM, Choudhury P, Kalra A, et al. Indian Academy of Pediatrics (IAP) recommended immunization schedule for children aged 0 through 18 years--India, 2014 and updates on immunization. Indian Pediatr. 2014 Oct; 51(10):785-800.
[5] Miller AB, Chamberlain J, Day NE, et al. Report on a workshop of the UICC project on evaluation of screening for cancer. Int J Cancer 1990;46:761-9
[6] Moyer VA; U.S. Preventive Services Task Force. Screening for cervical cancer: U.S. Preventive Services Task Force recommendation statement. Ann Intern Med 2012;156:880-91
[7] Sankaranarayanan R, Nene BM, Shastri SS, et al. HPV Screening for Cervical Cancer in Rural India. N Engl J Med 2009;360:1385-94
[8] Sankaranarayanan R, Budukh AM and Rajkumar R. Effective screening programmes for cervical cancer in low- and middle-income developing countries. Bull World Health Organ 2001;79:954-62
[9] Shepherd JH. Cervical and vulva cancer: changes in FIGO definitions of staging. Br J Obstet Gynaecol 1996;103:405-6

 

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