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प्रोस्टेट क्या है? (संरचना और कार्य) [1]

प्रोस्टेट ग्रंथि केवल पुरूषो में पाई जाती है जो उनके प्रजनन प्रणाली का एक हिस्सा है। यह मूत्राशय के नीचे और मलाशय के सामने स्थित होता है। पौरूष ग्रंथि मूत्रमार्ग के चारों और होता है, मूत्रमार्ग मूत्र को मूत्राशय से लिंग के रास्ते निष्कासित करता है। वीर्य पुटिका ग्रंथि जो वीर्य का तरल पदार्थ बनाती है पौरूष ग्रंथि के पीछे स्थित होती है। पौरूष ग्रंथि दो भागो में विभाजित होती है, दाँए और बाँए। [1,2]

Prostateउम्र के साथ पौरूष ग्रंथि के आकार में परिवर्तन होता रहता है। युवावस्था में पौरूष ग्रंथि के माप के में तीव्र वृद्धि होती है। एक व्यस्क पुरूष में पौरूष ग्रंथि का आकार 3 से.मी. मोटा और 4 से.मी. चौडा होता है (एक अखरोट के आकार के बराबर) और वजन 20 ग्राम तक होता है, लेकिन बुजुर्गों में यह और बड़ा हो सकता है। [1]

पौरूष ग्रंथि के कार्य: [1,3]
•    पौरूष ग्रंथि एक गाढ़े तरल पदार्थ का उत्पादन करती है। यह पदार्थ वीर्य को तरल बनाता है, तथा शुक्राणु कोशिकाओं का पोषण व रक्षा करता है।
•    यह मूत्र के प्रवाह को नियंत्रित करने में भी महत्तवपूर्ण भूमिका निभाता है।

प्रोस्टेट कैंसर क्या है?
प्रोस्टेट कैंसर प्रोस्टेट की कोशिकाओं में बनने वाला एक प्रकार का कैंसर है। यद्यपि पौरूष ग्रंथि में कई प्राकर की कोशिकाएँ पाई जाती है, लगभग सभी प्रोस्टेट कैंसर, ग्रंथि कोशिकाओं से विकसित करते है (एडिनोकार्सिनोमा)। अन्य प्रकार के प्रोस्टेट कैंसर कम पाये जाते हैं। [2]
प्रोस्टेट कैंसर आमतौर पर बहुत ही धीमी गति से बढ़ता है। ज्यादातर रोगियों में तब तक लक्षण नही दिखाई देते जब तक कि कैसर उन्नत अवस्था में नही पहुँचता। प्रोस्टेट कैंसर के मरीजों में से अधिकांश अन्य कारणों से मरते हैं। कई मरीजों को तो ज्ञात ही नहीं होता कि उन्हें प्रोस्टेट कैंसर हैं। लेकिन एक बार प्रोस्टेट कैंसर विकसित हो जाता है और बाहर की तरफ फैलने लगता है तो यह खतरनाक हो जाता है।

यदि प्रोस्टेट कैंसर का निदान जल्दी हो जाए (जब वो सिर्फ प्रोस्टेट ग्रंथि तक ही सीमित होता है) तो उपचार में ज्यादा सफलता मिलने की संभावना होती है।

 

आँकडे

आँकडे

प्रोस्टेट कैंसर भारत में होने वाले दस प्रमुख कैंसरों में से एक है। ग्लोबोकोन 2012 के अनुसार

घटना दर
मृत्यु दर
पाँच वर्षीय संभवता
19,095 12,231 63,818 

जीवित रहने की दर [5]
•    कुल मिलाकर 5 साल तक जीवित रहने की दर - 64%
         -     <59 साल - 55%
         -     60-69 साल - 74%
         -     >70 साल - 52%

भारतीय आँकड़े

प्रोस्टेट ग्रंथि कैंसर का दिल्ली, कोलकाता, पुणे और तिरूवनंपुरम में दूसरा, बेंगलुरू और मुबंई जैसे शहरो में होने वाले कैसरो में तीसरा और भारत की बाकी जनसख्या आधारित कैंसर रजिस्ट्रीज में दस प्रमुख कैंसरों में हैं। आंकड़े बताते हैं कि भारत के सभी क्षेत्र इस कैंसर से प्रभावित हैं। [6]

प्रोस्टेट कैंसर की घटना दर लगातार तीव्र गति से बढ़ रही हैं। यह अनुमान लगाया जा रहा हैं कि 2020 तक प्रोस्टेट कैंसर के मामले दुगुने हो जायेंगे। [7]


जोखिम कारक

जोखिम कारक

प्रोस्टेट कैंसर का खतरा बढ़ाने में निम्न कारक शामिल है:
•    उम्र: इस कैंसर का खतरा उम्र के साथ बढ़ता हैं। 40 वर्ष से कम उम्र में यह कैंसर बहुत ही कम पाया जाता है। लेकिन 50 वर्ष की उम्र के बाद प्रोस्टेट कैंसर का खतरा तेजी से बढ़ता है।[3, 8-10]  प्रोस्टेट कैंसर के 10 में से 6 मरीज 60 साल से अधिक आयु के होते है। [10]

जातीयता: प्रोस्टेट कैंसर गैर हिस्पैनिक गोरो की तुलना में एशियाई मूल के अमेरिकी और हिस्पैनिक/लैटिनो पुरूषो मे कम होता है। अन्य जातियों के पुरूषो की अपेक्षाकृत अफ़्रीकी पुरूषो मे प्रोस्टेट कैंसर का खतरा अधिक होता है। प्रोस्टेट कैंसर में इन नस्लीय और जातीय मतभेदो के कारण स्पष्ट नहीं है। [3, 8-11]

•    पारिवारिक इतिहास: यदि प्रोस्टेट कैंसर का पारिवारिक इतिहास है तो आपको कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता है । [3, 8-9, 12 ]

प्रभावित रिश्तेदारों की संख्या ज्यादा होने से भी खतरा अधिक बढ़ जता है, विशेषकर जब कैंसर युवा रिशतेदारों में पाया गया हो। [12]

•    अनुवांशिक परिवर्तन: बी.आर.सी.ए. 1 और बी.आर.सी.ए. 2 जीन जो पारिवारिक स्तन या अंडाशय के कैंसर के साथ जुड़े होते है, पुरूषों में प्रोस्टेट कैसर के खतरे को भी बढ़ा सकते है। [13, 14]

वंशानुगत पौलीपोसिस कोलोरेक्टल कैसर भी लिंच सिंड्रोम के रूप में जाना जाता है, वंशानुगत जीन परिवर्तन की वजह से होता है जो प्रोस्टेट कैंसर सहित कई तरह के कैंसरों के जोखिम को बढ़ाते है। [15, 16]

•  आहार: भोजन या खुराक के माध्यम से प्राप्त अतिरिक्त कैल्शियम; विशेष रूप से डेयरी खाद्य पदार्थ भी प्रोस्टेट कैंसर के विकसित होने के जोखिम को बढ़ाता है। [17, 18]

•  मोटापा:  अधिकांश अध्ययनों में मोटापे और प्रोस्टेट कैंसर में संबंध नहीं पाया गया हैं। किन्तु मोटे पुरूषों में प्रोस्टेट कैंसर का पता अधिक उन्नत चरणों में होने की संभावना होती है और उपचार होने में भी कठिनाई होती है। [18]

•  प्रोस्टेट की सूजन: कुछ अध्ययन बताते है की पौरूष ग्रंथि में सूजन कैंसर के खतरे को बढ़ाती है। लेकिन अन्य अध्ययन इसका खंडन भी करते है। [10, 19]

जाँच और पूर्व निदान

जाँच और पूर्व निदान [20]

प्रोस्टेट कैंसर का पता किसी व्यक्ति में रक्त मे प्रोस्टेट विशिष्ट प्रतिजन (प्रोस्टेट स्पेसिपिफक एंटीजन(PSA)) की मात्रा का परीक्षण करके पता लगाया जा सकता है। रक्त प्रोस्टेट कैंसर का जल्दी पता लगाने का तरीका डिजिटल गुदा परिक्षण (DRE) हैं।

इन परिक्षणों में से यदि किसी मे भी असामान्यता पायी जाती है तो चिकित्सक द्वारा आगे के परीक्षण कराये जाते है। यदि पी.एस.ए या डी.आर.ई के परीक्षण से कैंसर का पता लगता है तो उपचार समय पर हो सकता है।

किन्तु पी.एस.ए या डी. आर.ई परीक्षण मे से 100% सटीक नही होते। कभी-कभी ये परीक्षण किसी व्यक्ति को कैंसर होने परिणाम देते है, जबकि उसे कैंसर नही होता और कभी-कभी कैंसर की मौजूदगी में ये परिक्षण नकारात्मक परिणाम देते हैं। परीक्षण के अस्पष्ट परिणाम भ्रम और चिंता पैदा कर सकते है। मिथ्य सकारात्मक परिणाम की वजह से कुछ पुरूषों में अनावश्यक प्रोस्टेट बॉयोप्सी (टुकडे की जाँच) परीक्षण भी हो सकता है।

एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा यह है कि यदि स्क्रीनिंग में कैंसर का पता चलता है, तो डाक्टर यह यकीन से नही बता सकता कि कैंसर है या नहीं और तत्कार उपचार की आवश्यकता है या नहीं। वास्तव में कुछ प्रोस्टेट कैंसर तो इतने धीरे बढ़ते है कि कभी कोई परेशानी नहीं होती। लेकिन इन मरीजों का भी शल्य चिकित्सा या विकिरण से उपचार किया जा सकता है, जिसके कारण मूत्राशय अतरीयों तथा सेक्स संबंधी दुष्प्रभाव हो सकते है, जो व्यक्ति के जीवन को गुणवता को प्रभावित कर सकते है।

और पढ़े

रोकथाम

रोकथाम

क्योंकि प्रोस्टेट कैंसर के कारणों का अधिकांश मामलों में पता नहीं होता, इसलिए इसकी रोकथाम के विषय में भी जानकारी उपलब्ध नहीं हैं। फिर भी हम कुछ ऐसी आदतें अपना सकते हैं। जिनसे प्रोस्टेट व अन्य कैंसरों के होने की संभावना कम हो सकती हैं:- [21-23]
• संयमित वजन बनाए रखना।
• नियमित शारीरिक गतिविधियों में संलग्न रहें।
• उच्च-कैलोरी वाले खाद्य व पेय पदार्थों का सेवन कम करें।
• प्रतिदिन कम से कम ढाई कप फल तथा सब्जियां खाए।
• परिष्कृत अनाज के बजाय साबुत अनाज को चुने।
• संसाधित मांस व लाल मांस का सेवन कम करें।
• शराब का सेवन न करें या सीमित मात्रा में लें।
• डेयरी खाद्य पदार्थों का तथा कैल्शियम से भरपूर पदार्थों का सेवन कम करें।

संकेत एव लक्षण

संकेत एव लक्षण [2, 8-10]

आमतौर पर प्रारम्भिक अवस्था में प्रोस्टेट कैंसर के लक्षण दिखाई नही देते। उन्नत अवस्था में कुछ लक्षण उभर कर सामने आते है, जैसे कि :-
•    पेशाब करने में कठिनाई
•    मूत्र त्याग करने की अति-आवश्यकता
•    सामान्य से अधिक बार पेशाब करना, विशेष रूप से रात में
•    मूत्र की धारा के बल मे कमी
•    मूत्राशय खाली न होने की भावना
•    श्रोणि क्षेत्र में असुविधा
•    वीर्य में रक्त
•    स्तंभन दोष
•    हड्डियों में दर्द
•    मूत्र में रक्त (कभी कभी)
•    मूत्राशय या आंत्र नियंत्रण में क्षति
•    कमजोरी या पैर में सुन्नपन

मूत्र त्याग के लक्षण पौरुष ग्रंथि बढ़ने के कारण होते है जो मूत्र मार्ग पर दबाब डालते है। जिससे मूत्र प्रवाह प्रभावित होता हैै।

यह लक्षण कैंसर के अलावा प्रोस्टेट की सौम्य अवस्थाओं की वजह से भी हो सकते है। यदि आपको इनमें से कोई भी लक्षण है तो आपको अपने चिकित्सक से परामर्श करना चाहिये।

यदि कैंसर का पूर्व निदान होता है, तो सपफल उपचार की संभावना बढ़ जाती है।

निदान

निदान [24]

आमतौर पर प्रोस्टेट कैंसर की प्रारम्भिक अवस्था में कोई लक्षण पैदा नहीं होते लेकिन स्क्रींनिंग द्वारा इसका पहले पता लगाया जा सकता है। प्रोस्टेट कैंसर की उन्नत अवस्था में कैंसर के लक्षण दिखाई देते है जिनकी वजह से जाँच द्वारा प्रोस्टेट कैंसर का निदान किया जाता है।

चिकित्सा इतिहास और शरीरिक परीक्षण: यदि आपके चिकित्सक को यह संदेह है की आपको प्रोस्टेट कैंसर हो सकता है तो वह आपसे कुछ विशेष लक्षणों के बारे मे, जैसे मूत्र समस्या, यौन समस्याओं, हड्डी में दर्द के बारे में पूछ सकता है।
चिकित्सक डिजिटल गुदा परीक्षण भी कर सकता है। निष्कर्षो के आधर पर डाक्टर कुछ अन्य परीक्षणों की सलाह भी दे सकता है।

पी.एस.ए. रक्त परीक्षण: पी.एस.ए. ऐसा पदार्थ है जो पौरूष ग्रंथि द्वारा बनाया जाता हैै। इस परीक्षण को ज्यादातर उन पुरूषों में स्क्रींनिग के लिये इस्तेमाल किया जाता है जिनमें प्रोस्टेट कैंसर के सांकेतिक लक्षण दिख रहे हो।
यदि पी.एस.ए. का स्तर 4 और 10 नैनोग्राम/मि.लि. हो तो प्रोस्टेट कैंसर होने की संभावना 25% हैं।
यदि यह स्तर 10 नैनोग्राम/मि.लि. से अधिक हो तो कैंसर की संभावना 50% तक बढ़ जाती हैं। ज्यादातर स्वस्थ पुरुषों में पी. एस. ए. का स्तर 4 नैनोग्राम/मि.लि. से कम होना इस बात की गारंटी नहीं हैं कि प्रोस्टेट कैंसर नहीं हो सकता, कम स्तर के साथ भी लगभग 15% पुरुषों को बॉयोप्सी पर कैंसर होता हैं।
पी.एस.ए. स्तर निम्न कारकों द्वारा भी प्रभावित होता है:
•    कुछ चिकित्सा प्रक्रियाएँ
•    कुछ दवाएँ
•    बढ़ा हुआ प्रोस्टेट
•    प्रोस्टेट संक्रमण
इसलिए आपका चिकित्सक ही पी.एस.ए. स्तर के विषय में बेहतर जानकारी दे सकता है।

ट्राँसरैक्टल अल्ट्रासांउड: एक छोटा सा प्रोब मलाशय के अंदर रखकर प्रोस्टेट की छवियो की कंम्प्यूटर स्क्रीन पर देखा जाता है। इस विधि का उपयोग तब किया जाता है जब डी.आर.ई या पी.एस.ए. के परिणमों में असमान्यता पाई जाती है। यह प्रोस्टेट के आकार को मापने के लिये और प्रोस्टेट की निर्देशित बायोप्सी करने के लिये भी सहायक हैं।

प्रोस्टेट बायोप्सी: यदि लक्षणों के आधार पर यह संदेह है कि आपको प्रोस्टेट कैंसर हो सकता है तो चिकित्सक आपकी ट्रांसरेक्टल अल्ट्रासांउड के मार्गदर्शन में प्रोस्टेट की बायोप्सी करेगा।
बायोप्सी (टुकडे की जाँच) करने में आमतौर पर 10 मिनट का समय लगता है और यह बाह्य रोगी क्लीनिक या माइनर ओ.टी. में किया जा सकता है। टुकडे़ की जाँच को लैब में भेजा जाता है जहाँ इसमें कैंसर कोशिकाओं की जाँच की जाती है और कैंसर का ग्रेड (अवस्था) (ग्लीसन स्कोरिंग/ग्रेडिंग) भी आंकी जाती है।
टुकड़े की जाँच की जगह पर कुछ दिन तक घाव बना रह सकता है और आपके मूत्र, मल या वीर्य में खून भी आ सकता है।
हालांकि आमतौर पर कैंसर की पुष्टि बायोप्सी के द्वारा हो जाती है कुछ बायोप्सी के नमूनों मेें कैंसर ज्ञात नही हो पाता है। इस तरह के मामलों में चिकित्सक आपकी बायोप्सी (टुकड़े की जाँच) दोहराने की सलाह दे सकता है।

इमेजिंग परीक्षण: इमेजिंग परीक्षण द्वारा यह पता लगाया जाता है की कैंसर कहा तक फैला है।

बोन स्कैन: प्रोस्टेट कैंसर अक्सर पहले हड्डियों में फैलता है। इसका बोन स्कैन द्वारा पता लगाया जा सकता हैैै। बोन स्कैन में हड्डियों के क्षतिग्रस्त हिस्से "हॉटस्पॉट" के रूप में उभर कर आते हैं। हॉटस्पॉट हड्डियों में कैंसर के फैलाव को दर्शाते हैं परन्तु ये गठिया व अन्य हड्डी रोगों से भी हो सकते हैं। ऐसे में अन्य परिक्षण जैसे कि सी. टी. स्कैन / एम. आर. आई. या टुकड़े की जाँच से निदान की पुष्टि की आवश्यकता हो सकती हैं।

सी.टी. स्कैन: इस परीक्षण द्वारा लिम्फ नोड्स तथा दूसरे अंगों में प्रोस्टेट कैंसर का फैलाव देखा जा सकता है।

एम.आर.आई: यह प्रक्रिया प्रोस्टेट कैंसर का वीर्य पुटिका तथा आसपास के क्षेत्रों में फैलाव देखने में सहायक होती है।

अवस्था

प्रोस्टेट कैंसर की अवस्थायें [25]

प्रथम अवस्था: इस अवस्था में ट्यूमर प्रोस्टेट तक ही सीमित रहता है। इस अवस्था में पी.एस.ए. स्तर दस से कम होता है। ट्यूमर प्रोस्टेट की एक पालि के आधे से कम हिस्से में होता है।

दूसरी अवस्था: इस अवस्था में ट्यूमर प्रोस्टेट तक सीमित रहता है लेकिन पी.एस.ए. स्तर ज्यादा होता है।
•    पी.एस.ए. स्तर 10 से ज्यादा लेकिन 20 से कम होता है।
•    ट्यूमर प्रोस्ट की एक पालि के आधे से कम हिस्से में होता है।

तीसरी अवस्था: इस अवस्था में कैंसर प्रोस्टेट के बाहरी परत तक फैल जाता है और यह वीर्य पुटिका तक भी फैला हो सकता है। पी.एस.ए. स्तर कुछ भी हो सकता है।

चौथी अवस्था: इस अवस्था में ट्यूमर वीर्य पुटिका के आगे तक फैल जाता है और इसके आसपास के अंग जैसे कि मलाशय, मूत्राशय, लिम्फ नोड्स, हड्डियों या श्रोणि दीवार तक फैल जाता है। पी.एस.ए. का स्तर कुछ भी हो सकता है।

उपचार

प्रोस्टेट कैंसर के उपचार हेतु प्रोटोकाल [26]

अ.    परिसीमित रोग
(प्रथम और दूसरी अवस्था)  
1)    प्रोस्टेट कैंसर की शल्य चिकित्सा में प्रोस्टेट ग्रंथि, कुछ आसपास के उतक और कुछ लिम्फ नोड्स निकाले जाते है। निम्न परिस्थितियों में शल्य चिकित्सा नहीं की जाती: उम्र 75 वर्ष से अधिक, आयु संभावित 10 वर्ष से कम
2)    विकिरण चिकित्सा

ब.    स्थानीय स्तर पर अग्रिम रोग
(तीसरी अवस्था)
1)    शल्य चिकित्सा
2)    विकिरण (बाहरी बीम और ब्रेकीथेरेपी) हार्मोन चिकित्सा के साथ या बिना
3)    तत्काल अथवा विलंबित होर्मोनल संरोध – तत्काल हार्मोनल संरोध जीवन की गुणवता को बेहतर बनाता है। इस उपचार से रीड की हड्डी का दबाव, मूत्रवाहिनी में बाधा व वैकृत हड्डी का टूटना कम हो जाता है। किन्तु इस विषय पर शोध के परिणाम परस्पर विरोधी हैं।

स.    Metastatic Disease
(चतुर्थ चरण)
हार्मोन संवेदनशील रोग
•    हार्मोन थेरेपी का प्रयोग तब किया जाता है जब पुरूष हार्मोन टेस्टोस्टेरोन का उत्पादन शरीर में रोकना हो । दवाओं द्वारा टेस्टोस्टेरोन हार्मोन के उत्पादन को रोक दिया जाता है।
•    अंडकोष शल्य चिकित्सा (आर्कीऐक्टमी): इसमे शल्य चिकित्सा द्वारा अंडकोष को हटा दिया जाता है। अंडकोष के निकलने से शरीर में टेस्टोस्टेरोन का स्तर कम हो जाता है।
हार्मोन असंवेदशील रोग
कीमोथेरेपी: कीमोथेरेपी उपचार का प्रयोग तब किया जाता है जब प्रोस्टेट कैंसर शरीर के अन्य हिस्सो में फैल गया हो। यदि हार्मोन चिकित्सा काम नही करती तो कीमोथेरेपी एक विकल्प हो सकता है।
i.    डाकीटेक्साल प्लस प्रेडनिसोन
ii.    माइटोक्सानट्रोन प्लस स्टेरायड
iii.    बिसपफास्पफोनेटस (हड्डी में मेटास्टेसिस में प्रयोग)

द.    प्रोस्टेटक्टमी या विकिरण चिकित्सा के बाद पी.एस.ए. स्तर का बढ़ना – बिना लक्षणों के पी.एस.ए. स्तर का बढ़ना एक सामान्य समस्या है।  
1)    जोखिम मूल्यांकन – प्रथम यह निर्धारित किया जाना चाहिये कि पी.एस.ए. का बढ़ता स्तर उपचार की विफलता के कारण है या नहीं। इसके उच्च जोखिम कारक है ग्लीसन स्कोर >6, पी.एस.ए. >10, वीर्य पुटिका तक फैला कैंसर। पी.एस.ए. स्तर का छह महीने से कम समय में दुगना होना रोग के बढ़ने का संकेत हो सकता है।
2)    स्थानीय नियंत्रण – शल्यचिकित्सा के बाद विकिरण स्थानीय नियंत्रण प्रदान कर सकता है। परन्तु इससे उत्तर जीविता लाभ प्रदर्शित नही किया गया है। साथ ही विकिरण संबंधी जटिलता अधिक हो सकती है।  
विकिरण के उपरांत नाशरक्षण सर्जरी शल्य चिकित्सा की जटिलता की उच्च दरो की वजह से नही की जाती । अधिकांश पुरूषों को चिकित्सा उपचार दिया जाता है।

अनुवर्तन जाँच
प्रारभिक अवस्था में रोगनिवारण हेतु उपचार किय गये मरीजों में
प्रथम दो वर्षो में हर तीन महीने पर
पाँच वर्षो तक हर छह माह पर
उसके बाद हर साल
For patients with palliative situation: symptom based approach

सहायक देखभाल:
 बिस पफोस्पफोनेट्स

Zolendronic Acid (for CrCl > 30mL/min)
Analgesics
4mg IV q 3-4 weeks (for 6-9 months then at 3 monthly interval)
For adequate pain control

उपचार संबंधी जटिलताएॅ:

शल्य चिकित्सा:
•    मूत्र असंयमिता
•    नपुंसकता
•    गुदा से खून बहना (रक्तस्त्राव)

 विकिरण चिकित्सा:
•    नपुंसकता
•    गुदा में दर्द, ऐंठन, दस्त और अन्य लक्षण
•    मूत्राशय में रक्त मेह, जलन, असंयमिता आदि

हार्मोन थेरेपी:
•    अल्पजनन ग्रंथिता, नपुंसकता, कामेच्छा में कमी, माॅसपेशियों में शिथिलता, वसा उतको में वृद्धि, हड्डियों का कमजोर होना (आॅस्टियोपोटोसिस)
•    पसीना, गर्मी लगना व स्तन वृद्धि
•    कभी-कभी शुगर का बढ़ना, इंसुलिन का बढ़ना या इंसुलिन प्रतिरोध होना, वसा का असंतुतिल होना।

दस वर्षीय उत्तरजीविता की दरें (ए जे सी सी अवस्थाओं के अनुसार)
प्रथम अवस्था       85%
दूसरी अवस्था      72%
तीसरी अवस्था     55%
चौथी अवस्था      30%

संदर्भ

 संदर्भ

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